भ्रूण और शक्राणु कर्योपरेसेर्वेशन

1980 के दशक में कर्योपरेसेर्वेशन ने प्रजनन विज्ञानं के लिए नए दरवाजे खोले | इस तकनीक में भ्रूण, अण्डों और शक्राणुओं को संभल कर बहुत समय के लिए रखा जा सका है | शुरू-शुरू में जब यह तकनीक नए थी तब बहुत कम समय के लिए इन सबको ठंडा करके कुछ समय के लिए रखा जा सकता था |
भारत में अभी तक यह माना जाता है की संग्रह किये हुए और ठण्ड से थके हुए शक्राणु की प्रजनन समरथा कम होता है |

शुक्राणु क्रियोपेशेशेशन क्या है -

महिला को गर्भवती बनाने जिसमे परखनली शिशु और अन्य तकनीकें भी शामिल हैं , उनमे पुरुष से वीर्य लेने के लिए टेसे (टीइइसइ ) जैसी तकनीकों का उप्तोग होता है और अगर पुरुष में वीर्य का कोई भी कण न हो तो कहीं बाहर से वीर्य दान में लेना पड़ता है | इस के लिए हे संभल आकर रखे हुए क्रियोपेशेशेशन शुक्राणु से काम लिया जाता है |

शक्राणु क्यों संभाले जाते हैं -

– कैंसर जैसी बीमारयां जो की शक्राणु बनने के काम को रोक देती , उनके उपचार से पहले मनुष्य अपने शक्राणु संभल सकता है |
– पुरुष बाँझपन / अनियमित बाँझपन

भ्रूण संग्रह करना -

यह तब किया जाती है जब महिला के अंडाशय में बहुत से अंडे बन गए है और निकल भी लिए गए है | महिला को गर्भवती बनाने के लिए जितने अंडे चाहिए होते हैं , अण्डों की गिनती उनसे जायदा होने के कारन भ्रूण भी जायदा बना लिए जाते है | इन को बाद में उपयोग के लिए ठंडा करके रख लिया जाता है |

अंडों का क्रियोपेशेशेशन

अण्डों की अच्छी गुणवत्ता होने पर या फिर महिला की अपनी मर्जी से अंडो को ठंडा करके संग्रहित किया जाता है ता की बाद में उपयोग किये जा सकें | महिलाएं जो अभी गर्भधारण नहीं करना चाहती, वह भविष्य के लिए अंडे बचती हैं क्यूंकि | भविष्य में जायदा आयु का किसी चिकत्सा के कारन वह अंडे उतसर्जित नहीं कर पायेगी |

महिला इन अण्डों को दान भी कर सकती है | अण्डों को निकले से पहले कुदरती माहवारी के साथ साथ दवाइयों का भी सहारा लिया जाता है |

भारत में क्रियोपेशेशियन की लागत – यह लागत अंडे , शक्राणु और भ्रूण के लिए अगल अलग होती है | इसके इलावा गुणवत्ता का भी असर लागत पर पड़ता है |

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