भारत में प्रीमिंपन्टेशन आनुवंशिक परीक्षण

यह एक विधि है जिसमे भ्रूण बनने पर उसमे से अनुवांशिकी (माता-पिता से आने वाले ) विकार ढूंढ़ कर खतम किये जाते हैं | इस में आईवीएफ पर्किर्या में बनाये गए भ्रूणों को परीक्षित किया जाता है | बने हुए भ्रूण में अगर कोई जेनेटिक विकार मिले तो उसे उसी समय उपचार से ठीक किया जाता है या उस भ्रूण को प्रयोग में नहीं लाया जाता / खतम क्र दिया जाता है |
यह अनुवांशिकी बिमारियों को रोकने के लिए है |

पीजीडी कैसे किया जाता है?

यह पर्किर्या आईवीएफ के साथ ही जुडी हुई है और अंडा पुनर्प्रति और निशेषन के बाद शुरू होरी है | भ्रूण कोशिकाओं में विभाजित होता है उससे पहले यह जरूरी होता है |

पर्किर्या -

जब भ्रूण पांच दिन का होता है तो उसमे से कुछ कोशकाएँ निकली जाती हैं | इसमें सुखं शल्य-चिकत्सा उपयोग की जाती है |

– कोशिकाओं के अंदर का डीएनए यह पहचानने में मदद करता है की भ्रूण में कोई अनुवांशिकी समस्या है या नहीं | यह एक लम्बी पर्किर्या है और कम से कम पांच दिन में पूरी होती है |

– जब यह पता चल जाता है की भ्रूण मे कोई अनुबवंशिकी विकार नहीं है , तो यह महिला के गर्भधारण के लिए तैयार होता है और एक सफल गर्भधारण का कारन बनता है |

– अगर भ्रूण में कोई समस्या है तो इसे नष्ट क्र दिया जाता है | इसमें भण्डारण के लिए भी रखना उचित नहीं होता |

किन परिस्थयों में पीजीडी काम आता है ?

– जोड़े में से किसी एक में कोई पारिवारिक विकार है

– सम्भोग को लेकर कोई विकार है

– दोनों में किसी एक जीन को लेकर समस्या है |

– गुणसूत्र विकार

– महिला को आयु पैंतीस वर्ष से अधिक

– माहवारी का नुकसान

– एक से अधिक बार प्रजनन उपचार विफल होना |

पीजीडी के लाभ -

– जैविक पर्किर्या जारी रहती है

– गर्भवस्स्था में मदद

– भ्रूण के स्थानांतरण से पहले

समस्यें -

कई बार भ्रूण में कोई विकार नहीं होता , बल्कि गर्भावस्था के बहुत बाद में पाया जाता है | भ्रूण को जब नष्ट किया जाता है तो यह एक बच्चे की मौत होती है | जयादातर चिकत्सक इसकी सिफारिश नहीं करते |

भारत में जेनरिक टेस्टिंग काफी महंगी तकनीक है, क्यूंकि इसमें बहुत से परीक्षण होते हैं और सभी की लागत जुड़ती है |

सफल आईवीएफ उपचार

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